इस योजना के चलते कम होंगें गाँव में जमीन सम्बंधित विवाद……
लेख राजस्व विभाग के सौजन्य से आजमगढ़
उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज में आज भी एक बड़ी विडंबना यह रही है कि लाखों परिवार वर्षों से जिस घर में रह रहे हैं, वह घर कागजों में “किसी का” नहीं होता। गाँवों की आबादी भूमि पर बने मकानों का न तो कोई निश्चित नम्बर होता है, न कोई आधिकारिक पहचान और न ही स्वामित्व का स्पष्ट अभिलेख। इसी अस्पष्टता के कारण पीढ़ियों से ग्रामीण क्षेत्रों में कब्जे, बँटवारे, सीमांकन और पड़ोसी विवाद जैसी समस्याएँ जन्म लेती रही हैं। कई बार मामूली बात भी मारपीट, मुकदमेबाजी और सामाजिक कटुता तक पहुँच जाती है।
ऐसे में भारत सरकार की ‘स्वामित्व योजना’ और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लागू की गई ग्रामीण आबादी सर्वेक्षण एवं अभिलेख संक्रिया विनियमावली, 2020 एक दूरगामी और आवश्यक कदम के रूप में सामने आती है। इस योजना का सबसे अहम परिणाम है—‘घरौनी’, यानी ग्रामीण आवासीय अभिलेख, जो गाँव के हर मकान को एक अद्वितीय पहचान और स्वामित्व का प्रमाण देता है।
क्यों जरूरी है स्वामित्व योजना ‘घरौनी’?
ग्रामीण आबादी क्षेत्र राजस्व नक्शे में तो दर्ज होता है, लेकिन उसमें बसे परिवारों के मकानों की स्पष्ट रेखांकन और स्वामित्व की वैधानिक स्थिति अक्सर नहीं होती। यही कारण है कि— घर की जमीन पर स्वामित्व को लेकर पारिवारिक झगड़े होते हैं, पड़ोसियों के बीच सीमाओं पर विवाद बढ़ते हैं, सरकारी योजनाओं में वास्तविक लाभार्थी की पहचान कठिन होती है, ग्रामीण संपत्ति आर्थिक रूप से “मृत पूंजी” बनी रहती है, घरौनी इन सभी समस्याओं का समाधान एक साथ करती है, क्योंकि यह मकान और संपत्ति को कानूनी पहचान देती है। यह पहचान केवल विवाद कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देती है।

ड्रोन सर्वेक्षण: तकनीक से पारदर्शिता की ओर- इस योजना की सबसे उल्लेखनीय बात है—ड्रोन तकनीक का उपयोग। पारंपरिक सर्वे में त्रुटि, पक्षपात और विवाद की आशंका बनी रहती थी। लेकिन ड्रोन सर्वे से आबादी क्षेत्र का सटीक मानचित्र तैयार होता है और हर भूखंड की नम्बरिंग की जाती है।
योजना की प्रक्रिया भी तुलनात्मक रूप से पारदर्शी है—ग्राम सभा में योजना की जानकारी, निजी, सरकारी, अर्ध-सरकारी संपत्तियों का चिन्हीकरण, ड्रोन फोटो के आधार पर मानचित्र निर्माण, सूची प्रकाशन और ग्राम पंचायत स्तर पर सार्वजनिक जानकारी, आपत्तियों का आमंत्रण और समाधान अंतिम घरौनी और संशोधित मानचित्र जारी, यह प्रक्रिया बताती है कि सरकार ने विवादों की संभावना को कम करने के लिए सुलह-समझौते और आपत्ति निस्तारण को भी व्यवस्था का हिस्सा बनाया है।
आँकड़े बताते हैं योजना का विस्तार- प्रदेश में इस योजना को व्यापक स्तर पर लागू किया गया है। कुल 1,10,344 ग्रामों को अधिसूचित किया गया, जिनमें गैर-आबाद ग्रामों को छोड़कर 90,530 ग्रामों में ड्रोन सर्वेक्षण और घरौनी तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है। दिसंबर 2025 तक इन सभी ग्रामों का ड्रोन सर्वेक्षण पूर्ण होना योजना की बड़ी उपलब्धि है। इसके साथ ही 71,344 ग्रामों में 1,09,11,057 घरौनी तैयार/वितरित की जा चुकी हैं।यह आँकड़े दर्शाते हैं कि योजना कागजों में नहीं, बल्कि धरातल पर तेज़ी से आगे बढ़ रही है।
लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं- घरौनी की सफलता जितनी बड़ी है, उतनी ही जरूरी है कि इसे लेकर जागरूकता और भरोसा भी बढ़े। गाँवों में कई जगह— लोग दस्तावेज़ की अहमियत नहीं समझते, पुराने विवादों में आपत्तियों का समाधान कठिन होता है, स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोग प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर सकते हैं, तकनीकी त्रुटियाँ और सीमांकन की गलतियाँ विवाद बढ़ा सकती हैं, इसलिए जरूरी है कि प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता, ग्राम पंचायत की सक्रिय भूमिका और लोगों को सही जानकारी देने की व्यवस्था लगातार मजबूत की जाए।
घरौनी केवल कागज नहीं, गाँवों की स्थायी शांति की चाबी भी- घरौनी योजना का मूल उद्देश्य सिर्फ दस्तावेज़ बाँटना नहीं है, बल्कि ग्रामीण जीवन को विवादमुक्त, व्यवस्थित और आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है। जब हर घर की पहचान तय होगी, तो न केवल झगड़े घटेंगे, बल्कि ग्रामीण संपत्ति का मूल्य भी बढ़ेगा, बैंकिंग सुविधाएँ आसान होंगी और विकास योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति तक पहुँचेगा। कह सकते हैं कि ‘घरौनी’ गाँवों के लिए वही है, जो शहरों में हाउस नम्बर और रजिस्ट्री। यह योजना अगर पूरी ईमानदारी, पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ लागू होती रही, तो यह ग्रामीण भारत के सामाजिक ढाँचे और अर्थव्यवस्था—दोनों में स्थायी बदलाव ला सकती है।




