2011 के बाद यह पहली जनगणना, आएगा सभी के जीवन में बड़ा बदलाव….
नई दिल्ली। बहु प्रतीक्षित व हमेशा केंद्र सरकार पर निशाना साधने के लिए उपयोग हो रही भारत की जनगणना के संबंध में अब विराम लग गया, सोमवार को केंद्र सरकार ने 16 जून 2025 को 2027 की जनगणना के लिए अधिसूचना जारी कर दी है। यह भारत की 16वीं और देश के स्वतंत्रता के बाद 8वीं जनगणना होगी, जो दो चरणों में पूरी होगी। पहला चरण 1 अक्टूबर 2026 से लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले क्षेत्रों में शुरू होगा, जबकि दूसरा चरण 1 मार्च 2027 से देश के बाकी हिस्सों में होगा। परतंत्र भारत की पहली जनगणना 1872 में हुई थी, और स्वतंत्र भारत यह आठवीं जनगणना होगी, जिसका पूर्व के जनगणना से बिल्कुल अलग व्यवस्था होगा,
इस बार जनगणना डिजिटल माध्यम से होगी, जिसमें मोबाइल एप्लिकेशन और स्व-गणना का विकल्प होगा। इस में खास बात यह है कि पहली बार जातिगत गणना भी शामिल होगी, जो कई विपक्षी पार्टियों का प्रमुख मुद्दा भी रहा है, जिसमें प्रश्नावली में जाति का एक नया कॉलम जोड़ा जाएगा। लगभग 34 लाख गणनाकार और पर्यवेक्षक तथा 1.3 लाख जनगणना अधिकारी इस कार्य में शामिल होंगे। डेटा सुरक्षा के लिए कड़े उपाय किए जाएंगे। इस जनगणना में प्रत्येक परिवार की आवासीय स्थिति संपत्ति और सुविधाओं के विषय सहित एक घर या परिवार में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जनसंख्याकीय सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक और अन्य जानकारियां एकत्र की जाएगी यह सब दो चरणों में होना निश्चित है, प्राथमिक डेटा मार्च 2027 तक और विस्तृत डेटा दिसंबर 2027 तक जारी हो सकता है।

जातीय जनगणना भारतीय जीवन में सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और राजनीतिक समावेशिता को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि, इसके कार्यान्वयन में पारदर्शिता, संवेदनशीलता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखना आवश्यक है। यदि सही तरीके से उपयोग किया जाए, तो यह जनगणना भारत के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को और समृद्ध कर सकती है, लेकिन इसके दुरुपयोग से बचने के लिए मजबूत सुरक्षा उपाय और सर्वदलीय सहमति जरूरी है।

भारत में आखिरी बार 2011 में जनगणना हुई थी, जिसके आधार पर भारत में अभी तक जितने भी जनकल्याण की नीतियां सरकारी राशन वितरण योजना
आदि ऐसे कई कार्य 2011 के जनगणना के अनुसार ही किए जाते हैं जिससे देश के हर कोने में किसी भी योजना के पारदर्शिता में अघोषित रूप से दिक्कतें आती है, हालांकि 2011 की जनगणना में सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना (SECC) के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए थे, जिससे विश्वसनीयता पर सवाल उठे। नई जनगणना में पारदर्शिता और सटीकता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा।




