समाचार के पन्ने में नन्हें मुन्ने रोज़ेदार……
फूलपुर (आजमगढ़):पवित्र रमजानुल मुबारक की रहमतों और बरकतों के बीच आजमगढ़ जनपद के फूलपुर में इस बार एक विशेष दृश्य देखने को मिल रहा है। जहां बड़े-बुज़ुर्ग, महिलाएं और युवा पूरे एहतराम के साथ रोज़ा रख रहे हैं, वहीं नन्हे-मुन्ने बच्चे भी पूरी लगन, सब्र और दीनी जज़्बे के साथ इस इबादत में शरीक हो रहे हैं। इस मुकद्दस महीने में ये मासूम हाथ जब दुआ के लिए उठते हैं तो घर-परिवार के साथ-साथ समाज और मुल्क की अमन-ओ-चैन तथा तरक्की की कामना भी उनमें शामिल होती है।
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार- रमजान आत्मसंयम, तक़वा (परहेज़गारी), सब्र और शुक्र अदा करने का महीना है। रोज़ा केवल भूख-प्यास से बचने का नाम नहीं, बल्कि अपने अख़लाक, व्यवहार और नियत को भी पाक रखने का नाम इबादत है। ऐसे में कम उम्र के बच्चों का रोज़े की अहमियत समझना और उसे निभाने की कोशिश करना समाज के लिए एक प्रेरक संदेश है।
आइशा कलीम: कम उम्र में दीनी और दुनियावी तालीम का संतुलन

फूलपुर की 7 वर्षीय छात्रा आइशा कलीम इस विशेष अंक की पहली नन्ही रोज़ेदार हैं। 6 वर्ष की आयु में क़ुरआन शरीफ नाज़िरा मुकम्मल कर चुकी आइशा इस समय कक्षा UKG की छात्रा हैं। तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी आइशा पढ़ाई के साथ-साथ रोज़ा भी रख रही हैं। स्कूल, कोचिंग और अरबी ट्यूशन—सभी कार्य वह समय पर पूरा करती हैं।
परिवार के अनुसार, रोज़े के बावजूद उनकी दिनचर्या में कोई कमी नहीं आई है। दादी जैनब खातून ने पोती के इस जज़्बे पर ढेरों दुआओं से नवाज़ा। परिवार का मानना है कि दीन से जुड़ाव बच्चों के भीतर अच्छे संस्कार पैदा करता है और यही संस्कार आगे चलकर उन्हें समाज और देश का जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं।
मोहम्मद साहिर: तालीम के साथ दीन की राह

मुंशी दौलत लाल नगर वार्ड नं. 10, फूलपुर निवासी 10 वर्षीय मोहम्मद साहिर भी रोज़ा रख रहे हैं। पढ़ाई और ट्यूशन के साथ-साथ वह इस्लामी किताबों का अध्ययन कर रहे हैं। परिवार उनके दीनी समर्पण को देखकर गर्व महसूस कर रहा है। उनका कहना है कि बचपन से ही इबादत और नेक राह की तालीम इंसान को बेहतर इंसान बनाती है।
अहमद आज़मी: शुक्र और सब्र का पैगाम

निगार स्टूडियो मेन रोड, फूलपुर निवासी 10 वर्षीय अहमद आज़मी नियमित रूप से रोज़ा रख रहे हैं। उनका कहना है कि अल्लाह तआला ने हमें जिंदगी की हर नेमत अता की है और रमजान का महीना उसका शुक्र अदा करने का सबसे पाक मौका है। रोज़ा रखकर इंसान अल्लाह के और करीब हो जाता है।
यूसुफ फारूक: कम उम्र, बड़ा हौसला

कमरवा, आजमगढ़ निवासी 7 वर्षीय यूसुफ फारूक भी पूरे उत्साह से रोज़ा मुकम्मल कर रहे हैं। परिवार उनकी सेहत और दिनचर्या का विशेष ध्यान रख रहा है। वह सेहरी, नमाज़ और अफ्तार के तौर-तरीकों को सीखकर अमल में ला रहे हैं।
अरशयान जमाली: वक्त की पाबंदी और दीनी समझ

जमालपुर, आजमगढ़ के 7 वर्षीय अरशन जमाली भी इस खास सूची में शामिल हैं। सेहरी से लेकर मग़रिब की अज़ान तक वह पूरे अनुशासन के साथ रोज़ा निभा रहे हैं। परिवार उन्हें न केवल रोज़े की अहमियत समझा रहा है, बल्कि नमाज़ और इस्लामी शिक्षाओं की जानकारी भी दे रहा है। इन नन्हे रोज़ेदारों का जज़्बा यह दर्शाता है कि घर ही बच्चों की पहली पाठशाला है और माता-पिता उनके पहले शिक्षक। जब परिवार दीनी और नैतिक मूल्यों से जुड़ा होता है, तो बच्चे भी उसी राह पर चलने की प्रेरणा लेते हैं।
रमजान का महीना केवल इबादत का नहीं, बल्कि इंसानियत, भाईचारे और समाज में अमन कायम करने का पैगाम देता है। इन मासूम चेहरों की दुआओं में देश और दुनिया की खुशहाली की कामना शामिल है।
ZFM TIMES (प्योर लीफ) परिवार इन सभी नन्हे रोज़ेदारों के उज्ज्वल भविष्य, बेहतर सेहत और कामयाबी की दुआ करता है। खुदा से यही दुआ है कि इनकी मुस्कान कायम रहे और ईद की खुशियां दोगुनी हो जाएं।







