ईरान में आर्थिक विरोध बना राजनीतिक, धार्मिक आंदोलन, ट्रम्प की ख़ामेनेई को चेतावनी!

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सड़कों पर उतरी जनता, सरकार पर बढ़ता दबाव……

वाशिंगटन, 11 जनवरी। ईरान में दिसंबर 2025 के अंत से शुरू हुआ आर्थिक संकट के खिलाफ विरोध अब एक व्यापक राजनीतिक, धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध आंदोलन में तब्दील हो गया है। शुरुआत में यह प्रदर्शन महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी और ईरानी मुद्रा रियाल के लगातार गिरते मूल्य को लेकर थे, लेकिन धीरे-धीरे इनका रुख सीधे इस्लामिक शासन की वैधता को चुनौती देने की ओर मुड़ गया है।

शनिवार को सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा, जिसमें तेहरान के पुनक स्क्वायर पर हजारों प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ नजर आई। रात के समय कड़ाके की ठंड के बावजूद प्रदर्शनकारियों का जोश कम नहीं दिखा। लोग बर्तन बजाते हुए और सरकार विरोधी नारे लगाते हुए सड़कों पर डटे रहे। वीडियो में भीड़ की संख्या के साथ-साथ उनका उत्साह और आक्रोश साफ झलक रहा है।

मौतों और घायलों की बढ़ती संख्या- मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, इन प्रदर्शनों के दौरान अब तक कम से कम 78 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। इनमें करीब 50 प्रदर्शनकारी और 15 सुरक्षाकर्मी शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का दावा है कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक हो सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक, केवल तेहरान के कुछ अस्पतालों में ही एक रात के भीतर सैकड़ों घायल और मृतकों के मामले दर्ज किए गए हैं।

इंटरनेट बंद, फिर भी नहीं थमा विरोध- स्थिति को काबू में करने के लिए ईरान सरकार ने 7 जनवरी से देशभर में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद कर दी हैं। इसके बावजूद विरोध-प्रदर्शन थमने के बजाय और तेज हो गए हैं। तेहरान के अलावा तबरेज़, मशहद और कुर्द बहुल इलाकों सहित 100 से ज्यादा शहरों में लोग सड़कों पर उतर चुके हैं।

सरकार का सख्त रुख- ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने प्रदर्शनकारियों पर विदेशी ताकतों से जुड़े होने का आरोप लगाया है। वहीं, देश के अटॉर्नी जनरल ने चेतावनी दी है कि विरोध में शामिल लोगों को “भगवान का दुश्मन” करार देकर मौत की सजा तक दी जा सकती है। इन बयानों से देश में तनाव और बढ़ गया है।

अमेरिका की प्रतिक्रिया से बढ़ी अंतरराष्ट्रीय हलचल

इस बीच अमेरिका की प्रतिक्रिया ने हालात को और जटिल बना दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानी जनता की मदद का आश्वासन दिया है। उन्होंने दावा किया कि ईरान “आजादी की ओर बढ़ रहा है” और अमेरिका हर तरह की मदद के लिए तैयार है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि ईरान में हालात पहले कभी इतने निर्णायक नहीं रहे।

समाचार एजेंसी सिन्हुआ के मुताबिक, ट्रंप और अमेरिकी प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हत्या होती है तो अमेरिका कार्रवाई कर सकता है। हालांकि ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब जमीनी स्तर पर सेना भेजना नहीं है, बल्कि उन ठिकानों पर कड़ा प्रहार करना है “जहां सबसे ज्यादा दर्द होगा।”

ईरान का पलटवार- ईरान के विदेश मंत्रालय ने ट्रंप प्रशासन के बयानों की कड़ी निंदा की है। मंत्रालय ने कहा कि ये बयान दखल देने वाले और जनता को गुमराह करने वाले हैं, जो यह दिखाते हैं कि अमेरिका अब भी ईरानी जनता के प्रति दुश्मनी रखता है।

ईरान की सेना की चेतावनी और एकजुटता की अपील

ईरान की सेना ने भी बयान जारी कर कहा है कि वह देश के हितों, अहम ढांचों और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सरकारी प्रसारक के अनुसार, सेना ने जनता से एकजुट रहने और “दुश्मनों की साजिशों” को नाकाम करने की अपील की है। सेना ने अपने बयान में आरोप लगाया कि इजरायल और कुछ आतंकी संगठन शहरों में अशांति फैलाने और जनता को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। सेना का कहना है कि ये ताकतें ईरानी जनता के समर्थन के नाम पर एक और विद्रोह भड़काना चाहती हैं।

आर्थिक संकट बनी जड़- गौरतलब है कि दिसंबर के अंत से ईरान के कई शहरों में हो रहे प्रदर्शनों की जड़ में देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था है। रियाल के तेजी से गिरते मूल्य और लंबे समय से चली आ रही आर्थिक परेशानियों ने जनता के आक्रोश को भड़का दिया है। ईरानी सरकार ने माना है कि विरोध हुए हैं और दावा किया है कि वह लोगों की आर्थिक समस्याओं को सुलझाने के लिए तैयार है, लेकिन साथ ही हिंसा और तोड़फोड़ के खिलाफ सख्त चेतावनी भी दी है।कुल मिलाकर, ईरान में हालात तेजी से बदलते दिख रहे हैं, जहां आर्थिक असंतोष अब राजनीतिक चुनौती में बदल चुका है और इसका असर देश के भीतर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी साफ दिखाई दे रहा है।

इन सबके बीच ईरान में हिंदुओं की स्थिति

ईरान में हिंदू आबादी बहुत कम है, जो कुल जनसंख्या का एक छोटा हिस्सा है; विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, यह संख्या लगभग 20,000 से 40,000 के बीच है, जिसमें 2015 के आँकड़ों के अनुसार लगभग 39,200 हिंदू थे और 2020 में यह लगभग 20,000 दर्ज की गई थी, और यह समुदाय मुख्य रूप से बंदर अब्बास, ज़ाहेदान, और तेहरान में केंद्रित है, जहाँ उनके मंदिर और इस्कॉन जैसी संस्थाएँ मौजूद हैं, लेकिन इस आंदोलन से उनको कोई खतरा होता नहीं दिख रहा।

ZFM Times
Author: ZFM Times

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