विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस को संबोधित करते हुए कुलपति की पलके हुई नम!

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14 अगस्त को देश का नहीं दिलों का भी बंटवारा हुआ…

आजमगढ़। महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय आजमगढ़ में स्थित प्रशासनिक भवन के सभागार में 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 संजीव कुमार की अध्यक्षता में मनाया गया। कुलपति ने अपने सारगर्भित संबोधन में कहा कि आज ही का दिन यानी 14 अगस्त 1947 हम हिंदुस्तानियों के लिए अत्यंत पीड़ा दायक रहा। क्योंकि चंद स्वार्थी व अज्ञानी तथा ब्रिटिश हुकूमत की साजिशी हरकत के कारण भारत मां के दो टुकड़े हुए। एक का नाम है हिंदुस्तान एवं दूसरे का पाकिस्तान हुआ, अंग्रेजी हुकूमत ने बंटवारा करते समय देश को छिन्न-भिन्न करने में कोई कोर -कसर नहीं छोड़ी। विभाजन की विभिषिका का कथानक तो और पीड़ादायक है वह क्षण कितना विभत्स रहा होगा जब एक तरफ हमें स्वतंत्रता की खुशी तो दूसरी तरफ विभाजन का दंश झेलना पड़ा। इस पर जनमानस तथा कई लोग तरह-तरह की कहानियां सुने होंगे ।लोक-बाग एक दूसरे को यह कहते हुए सुने गए कि भागो जल्दी भागो देश विभाजित हो गया। पीड़ा इतनी असहनीय थी कि आमजन कभी नेतृत्व को कोसता नजर आया कभी अपने भाग्य को। घर के बुजुर्ग वर्ग अपने मवेशियों से जब दूर हो रहे थे तो उनकी पीड़ा व्यक्त किया जाना मंच से संभव नहीं है। लोग भागते, गिरते ,उठते रेलवे स्टेशन पर पहुंच कर मालगाड़ी हो या सवारी गाड़ी अपने-अपने गंतव्य की तरफ भाग रहे थे। लाशों का अंबार लगा था, मनुष्य भेड़िया हो गया था एक दूसरे को गाजर मूली की तरह काट रहे थे। यह आम स्टोरी नहीं है। इस विभीषिका की शुरुआत निश्चित ही झकझोर देने वाली थी। गांव-गिराव का बंटवारा हो या जल का बंटवारा सभी मां की छाती को छलनी कर रहे थे। लोग अपना घरौंदा छोड़कर जब भाग रहे थे तो आज की तिथि मे उसे शत्रु संपत्ति कहा गया। वतन का बंटवारा दो ही परिस्थितियों में होता है या तो जबरन जो 14 अगस्त 1947 को हुआ था या आमजन आजीविका के लिए बाहर जाता है। आश्चर्य यह भी है कि अपना घर बार छोड़कर आए हुए शरणार्थी कभी भी आपको भीख मांगते नहीं दिखेंगे कभी किसी से कुछ नहीं मांगे। उन्होंने ठेला, खोमचा ढाबा आदि लगाकर अपने कर्म पर भरोसा किया। आज राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। कुलपति ने एक चर्चित कहावत का उल्लेख करते हुए ” जाके पाँव न फटी बेवाई, वो का जाने पीर पराई” के माध्यम से उन्होंने आधार में उपस्थित सभी जनों को तत्कालीन पीड़ा से अपने को जुड़े रहने को कहा। मेरी समझ से बटवारा देश का नहीं दिलों का भी हुआ ।क्योंकि वर्तमान फिल्मी हस्तियों में राजकपूर जी का पूरा परिवार पाकिस्तान छोड़कर हिंदुस्तान आया । अंत में उन्होंने “एक भारत श्रेष्ठ भारत “के जोरदार नारे के साथ अपनी बात को समाप्त किया।

विश्वविद्यालय के कुलसचिव अंजनी कुमार मिश्र एवं उप कुलसचिव केश लाल ने कार्यक्रम के आयोजन समिति को बहुत-बहुत बधाई दी। उन्होंने कहा कि मेरी समझ से इस तरह के आयोजन ऐतिहासिक घटनाओं को रिव्यू करने हेतु आवश्यक हैं। विभाजन की प्रक्रिया भी शरारत पूर्ण थी अंग्रेजी चाल से हम फंस गए परिणाम साफ है विवाद पर विवाद। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए सबको सकारात्मक रहने का अनुरोध किया। कार्यक्रम के संयोजक प्रो0 प्रशांत राय ने कहा कि विभाजन शब्द ही पीड़ा दायक है इस संबंध में अ ट्रेन द पाकिस्तान व हे- राम पुस्तक आप जरुर पढ़ें। विभाजन का कच्चा चिट्ठा सामने रहेगा। प्राध्यापिका त्रिशिका एवं डॉ0 देवेंद्र पांडे ने विभाजन को अत्यंत डरावना बताया, कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त सहायक कुल सचिव डॉ महेश श्रीवास्तव ,डॉ प्रवेश , डॉ पंकज ,डॉ जयप्रकाश एवं विश्वविद्यालय के गणमान्य प्राध्यापक गण एवं छात्र-छात्राएं तथा कुलपति के निजी सचिव भूपेंद्र पांडे एवं विपिन शर्मा मीडिया प्रभारी डॉ. प्रवेश कुमार सिंह भी उपस्थित रहे।

ZFM Times
Author: ZFM Times

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