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रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर, याचिकर्ता ने भारत सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए, 50 लाख रुपये मुआवजा और भारत में रहने के लिए परमिट कि की मांग!

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जनहित याचिका पर भारत के लोगों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर छिड़ी बहस, लोगों ने तंज करते हुए कहा कि भारत को धर्मशाला ही घोषित कर दिया जाए….

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में एक अलग विषय को लेकर जनहित याचिका दाखिल की गई है, जिस पर पूरे हिंदुस्तान सहित विदेश के लोगों की भी नजर है, इस याचिका में केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि 43 रोहिंग्या शरणार्थियों को हाथ और आंखें बांधकर समुद्र में फेंक दिया गया है। याची का कहना है कि इन लोगों को वापस लिया जाए।

इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट में दायर नई रिट याचिका में याचिकाकर्ता ने मांग की है कि रोहिंग्याओं को वापस बुलाकर सम्मान के साथ, 50 लाख रुपये मुआवजा और भारत में रहने का परमिट दिया जाए, हालांकि इस याचिका को लेकर लोगों में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही है, बताया जाता है कि यह जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली के दो रोहिंग्या शरणार्थियों, जिनमें मोहम्मद इस्माइल का नाम शामिल है, द्वारा दायर की गई है, 

इस याचिका में सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा गया कि रोहिंग्या शरणार्थियों को सरकार ने जबरन बाहर निकाला है। आरोप है कि 43 रोहिंग्या रिफ्यूजियों में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग शामिल हैं। इसके अलावा कई लोग तो इनमें ऐसे हैं, जिन्हें कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां भी हैं। याचिका में मांग की गई है कि इन शरणार्थियों को दिल्ली वापस लाया जाए और कस्टडी से रिहा किया जाए।याचिका में आरोप लगाया गया है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को पहले एयरपोर्ट ले जाया गया। इसके बाज इन्हें पोर्ट ब्लेयर में ले जाकर नेवी के जहाजों में बिठा दिया गया। इस दौरान इन लोगों की आंखों और हाथों को बांध दिया गया था। यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि इन लोगों की जिंदगी की परवाह किए बिना ही इन्हें समुद्र के पानी में फेंक दिया गया। याची ने कहा कि इन शरणार्थियों को बायोमीट्रिक डिटेल लेने के लिए बुलाया गया था, लेकिन उन्हें फिर रिहा नहीं किया गया। इसकी बजाय इन लोगों को जबरन ही देश से बाहर कर दिया गया। वहीं इस मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का ही जिक्र किया।

उन्होंने कहा कि 8 अप्रैल 2021 को शीर्ष अदालत ने आदेश दिया था कि सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह कानून के तहत इन लोगों को वापस भेजने की कार्रवाई करे। जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व वाली बेंच के समक्ष याचियों ने कहा कि इन शरणार्थियों के पास UNHRC की ओर से जारी किए गए कार्ड भी थे। फिर भी इन लोगों को अरेस्ट किया गया और देश से बाहर निकाला गया है। दरअसल अप्रैल 2021 के अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा कि आर्टिकल 14 और 21 के तहत मूल अधिकारों की गारंटी भारतीय नागरिकों और अन्य लोगों को है। लेकिन इसमें यह गारंटी शामिल नहीं है कि कोई यदि अवैध रूप से भारत में एंट्री कर जाए तो उसे बाहर नहीं निकाल जाएगा।

ZFM Times
Author: ZFM Times

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